वह समय था जब दिन शाम में मुड़ रहा था। नदी — चौड़ी और चाँदी जैसी — बिना जल्दबाज़ी के बह रही थी। सारस अपने घोंसलों की ओर पंक्ति में लौट रहे थे। लगभग ग्यारह साल का एक लड़का, अब भी कंधे पर बस्ता टाँगे हुए, घाट के किनारे धीरे-धीरे चल रहा था। उसके भीतर अपनी उम्र से ज़्यादा सोच चल रही थी।
पानी के पास एक चपटी चट्टान पर एक बूढ़ा बैठा था। उसके वस्त्र मिट्टी के रंग के थे। उसके पैर नंगे थे। वह न कुछ जप रहा था, न समाधि में था। वह बस नदी को देख रहा था — जैसे कोई पुराने मित्र को देखता है।
लड़का कुछ कदम पहले रुक गया। बूढ़े ने मुड़कर मुस्कुराया, जैसे वह उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
संत:
बैठो, बेटा।
लड़का बैठ गया।
संत:
तुम्हारे भीतर कोई प्रश्न पल रहा है। पूछो।
एक — क्या सचमुच कोई ईश्वर है?
बालक:
महाराज... क्या सचमुच कोई ईश्वर है? मेरी माँ रोज़ शाम को दीया जलाती हैं। मेरी दादी व्रत रखती हैं और पूजा करती हैं। पर मैंने कुछ किताबें पढ़ी हैं — हिचेन्स साहब, डॉकिन्स साहब — वे कहते हैं यह सब बस कहानियाँ हैं। कि ब्रह्मांड केवल परमाणुओं का खेल है। और मैं सोचता हूँ — अगर कोई दयालु, सर्वशक्तिमान ईश्वर होता, तो इतनी पीड़ा क्यों होने देता? छोटी-छोटी लड़कियों को बुरे लोग चोट क्यों पहुँचाते हैं? ईमानदार लोग ग़रीब क्यों हैं और क्रूर लोग अमीर? एक प्रेमपूर्ण ईश्वर यह सब क्यों होने दे? इसलिए मुझे समझ नहीं आता कि क्या मानूँ।
संत ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक छोटा पत्थर हाथ में लिया, उसे तौला, और नदी में फेंक दिया। पानी में लहरों का एक छल्ला बना, किनारे तक पहुँचा, और मिट गया।
संत:
तुमने वही प्रश्न पूछा है, बेटा, जो ऋग्वेद के ऋषियों ने चार हज़ार साल पहले पूछा था। दसवें मण्डल में एक सूक्त है — नासदीय सूक्त। सृष्टि का वर्णन करने के बाद वह यूँ समाप्त होता है: ‘यह सृष्टि कहाँ से उठी — शायद इसने अपने आप को बनाया, शायद नहीं। केवल वही जानता है जो सबसे ऊँचे आकाश से इसे देखता है। और शायद वह भी न जानता हो।’
लड़के ने पलकें झपकाईं।
संत:
देखा, बेटा? हमारा सबसे प्राचीन ग्रंथ किसी ठोस उत्तर से शुरू नहीं होता। वह इस साहस से शुरू होता है कि कह सके — ‘हम नहीं जानते। शायद वह भी नहीं जानता।’ तो जब तुम संदेह करते हो, तुम अच्छी संगति में हो।
बालक:
पर यह उत्तर तो नहीं है।
संत:
नहीं। यह पहला पाठ है — कि प्रश्न उत्तर से बड़ा है। अब आओ, धीरे-धीरे इसमें उतरें।
दो — आइंस्टाइन ने ईश्वर के बारे में क्या सोचा?
बालक:
हाँ! यही तो मैं पूछना चाहता था। मैं आइंस्टाइन के बारे में पढ़ रहा था। उन्होंने कुछ अजीब बात कही थी। उन्होंने कहा कि वे ‘स्पिनोज़ा के ईश्वर’ में विश्वास करते थे, पर किसी व्यक्तिगत ईश्वर में नहीं। महाराज, इसका क्या अर्थ है?
संत की आँखें चमक उठीं।
संत:
आह! तुम सही चीज़ें पढ़ रहे हो। आइंस्टाइन सौ साल पहले हुए थे, पर वे हमारे ऋषियों के बहुत पास हैं — कई पंडितों से भी पास। ध्यान से सुनो — मैं तुम्हें बताता हूँ कि उनका क्या मतलब था, क्योंकि यही हमारी बातचीत का हृदय है।
बहुत समय पहले हॉलैंड में एक शांत दार्शनिक रहते थे — बारुख स्पिनोज़ा। वे काँच के लेंस घिसकर जीवन चलाते थे। युवावस्था में उन्हें अपने ही समाज से धर्म-विरोध के आरोप में बाहर कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने मानने से इनकार कर दिया कि कोई ऐसा ईश्वर है जिसे चापलूसी से प्रसन्न किया जा सके, रिश्वत दी जा सके, या जिसे ठेस पहुँचाई जा सके। पर वे डॉकिन्स की तरह नास्तिक नहीं थे। उन्होंने और गहरी बात कही। उन्होंने कहा — ‘Deus sive Natura’ — ईश्वर अथवा प्रकृति। दोनों एक ही चीज़। एक ही सत्य के दो नाम।
स्पिनोज़ा के लिए ईश्वर ब्रह्मांड के बाहर बैठा कोई व्यक्ति नहीं था जो हमें देख रहा हो। ईश्वर भावनाओं वाला कोई सम्राट नहीं था। ईश्वर वह स्वयं तत्व था जिससे सब कुछ बना है। नदी ईश्वर है। ऊपर उड़ता सारस ईश्वर है। यह पत्थर जो मैंने अभी फेंका, ईश्वर है। तुम ईश्वर हो। मैं ईश्वर हूँ। इस मूर्खतापूर्ण अर्थ में नहीं कि हम उड़ने वाले देवता हैं — बल्कि इस अर्थ में कि हम सब एक ही अंतर्निहित सत्य के अलग-अलग रूप हैं, उसके चेहरे हैं। उसके बाहर कुछ नहीं है। उसका कहीं और होना संभव नहीं है। लहर को समुद्र खोजने की ज़रूरत नहीं — वह स्वयं समुद्र है, जो थोड़ी देर के लिए लहर का रूप ले रहा है।
जब तुम यह बात — सच में — समझ लेते हो, तो तुम ‘क्या ईश्वर है?’ पूछना उसी तरह छोड़ देते हो जैसे पानी में तैरते हुए तुम ‘क्या समुद्र है?’ पूछना छोड़ देते हो। प्रश्न ही घुल जाता है। तुम उसी में हो। तुम उसी से बने हो।
आइंस्टाइन ने स्पिनोज़ा को पढ़ा और गहरे प्रभावित हुए। उन्होंने एक बार एक रब्बी को कहा था कि वे केवल स्पिनोज़ा के ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं — एक ऐसा ईश्वर जो ब्रह्मांड की व्यवस्थित सुंदरता में प्रकट होता है — न कि ऐसा ईश्वर जो छोटे-छोटे मनुष्यों के भाग्य की चिंता करता हो। समझे? उन्होंने भौतिकी के समीकरणों को देखा — कि एक ही नियम सेब को गिरने पर मजबूर करता है और चाँद को कक्षा में बाँधता है — और उन्हें विस्मय हुआ। उन्होंने महसूस किया कि ब्रह्मांड नियमबद्ध है, सुंदर है, समझा जा सकने वाला है। और इस अनुभूति को उन्होंने धार्मिक कहा। उन्होंने इसका नाम दिया — ‘ब्रह्मांडीय धर्मभाव’।
बालक:
पर — यह तो बस प्रकृति की प्रशंसा है। इसे धर्म क्यों कहें?
संत:
बहुत बढ़िया। प्रश्न करो। यही तो ठीक प्रश्न है। सुनो।
तीन — तीन प्रकार के धर्म
संत:
आइंस्टाइन ने एक बार कहा था कि एक विचारशील प्राणी के लिए सबसे गहरा अनुभव रहस्य का अनुभव है — और यही सच्ची कला और सच्चे विज्ञान दोनों का स्रोत है। जिस व्यक्ति में आश्चर्य करने की क्षमता मर जाए, वह किसी अर्थ में जीवित रहना बंद कर चुका है। यह बात याद रखो। यह एक मशाल है।
अब सुनो — दुनिया में तीन प्रकार के धर्म हैं, और आइंस्टाइन ने तीनों के नाम बताए।
पहला है — डर का धर्म। जब आदिम मनुष्य आँधी, बाघ, भूकंप और मृत्यु से डरते थे, तो उन्होंने माँगने के लिए देवता बनाए। ‘प्रभु, मुझ पर वज्रपात न करो। पानी भेजो। फसल बचाओ।’ यह बच्चों जैसा धर्म है। जब जीवन छोटा और अनिश्चित था, तब काम चलता था। पर यह गहरी जाँच में नहीं टिकता। यह गुफा का धर्म है।
दूसरा है — नैतिकता का धर्म। यहाँ ईश्वर एक महान न्यायाधीश है। ‘अच्छे बनो वरना दण्ड पाओगे। अच्छे रहोगे तो स्वर्ग पाओगे।’ यह आज के अधिकांश मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों का धर्म है। यह मूर्ख नहीं है। यह छोटे बच्चों को दया सिखाता है। यह समाज में व्यवस्था लाता है। पर यह अधूरा है। क्योंकि — जैसा तुमने स्वयं देखा — संसार सच में अच्छों को पुरस्कार और बुरों को दण्ड देता हुआ नहीं दिखता। ऐसा भरोसेमंद ढंग से नहीं होता। बहुधा होता ही नहीं। तो जिसका धर्म इसी पर टिका हो, वह धर्म कभी न कभी टूट जाएगा। तुम्हारा टूटने लगा है, है न? इसलिए तुम मेरे पास आए हो।
लड़के ने आश्चर्य से सिर हिलाया।
संत:
तीसरा — और आइंस्टाइन ने इसे सबसे ऊँचा कहा है — ब्रह्मांडीय धर्मभाव। यह तब आता है जब तुम ब्रह्मांड से माँगना बंद कर देते हो, और बस यह देखते हो कि ब्रह्मांड ‘है।’ कि शून्य के स्थान पर कुछ है। कि वही गणित जो आकाशगंगाओं को घुमाता है, फूल भी खिलाता है। कि गुरुत्व का एक ही नियम चाँद को कक्षा में रखता है और मेरे फेंके पत्थर को धरती पर लाता है। कि कुछ तारों का प्रकाश दस अरब साल चलकर आज रात तुम्हारी आँख में प्रवेश कर रहा है। कि तुम — एक छोटा बालक नदी किनारे — प्राचीन तारों के भीतर बने परमाणुओं से बने हो। तुम्हारे रक्त में जो लोहा है, वह कभी किसी मृत होते सूर्य का हृदय था। यह जानकर अप्रभावित रहना संभव नहीं।
यही अनुभूति — इस ‘है’ के क्रम, गहराई और अद्भुतता के सामने झुक जाने का भाव — उसे आइंस्टाइन ने धार्मिक कहा। एक प्रसिद्ध निबंध में उन्होंने इसी सच्ची धार्मिकता को परिभाषित किया था: यह जानना कि ब्रह्मांड में गहरा कारण और दिव्य सौंदर्य है, जिसे हम केवल आरंभिक रूप में ही समझ पाते हैं, और इस तथ्य के सामने हृदय में जागने वाली श्रद्धा और विनम्रता ही असली धर्म है। इस अर्थ में, और केवल इसी अर्थ में, उन्होंने स्वयं को गहरा धार्मिक कहा।
तीनों धर्मों का अंतर समझे? डर का ईश्वर कहता है — ‘मुझसे डरो।’ नैतिकता का ईश्वर कहता है — ‘मेरी आज्ञा मानो, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा।’ पर ब्रह्मांडीय ईश्वर — स्पिनोज़ा का ईश्वर, आइंस्टाइन का ईश्वर, उपनिषदों में जिसकी ओर इशारा है — कुछ नहीं कहता। उसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। उसका होना ही पूरा भाषण है।
लड़के ने नदी की ओर देखा। एक चमगादड़ झपटकर निकल गया। वह बहुत देर चुप रहा।
बालक:
पर महाराज, यह तो प्रेम जैसा नहीं लगता। स्पिनोज़ा का ईश्वर मुझसे प्रेम तो नहीं करता।
संत:
ठीक है। वह तुमसे उस तरह प्रेम नहीं करता जैसे तुम्हारी माँ करती है। वह भीड़ में से तुम्हें चुनकर अलग नहीं करता। कर ही नहीं सकता। क्योंकि वही भीड़ है। वही तुम्हारी माँ है। वही तुम हो। प्रेम वहाँ से यहाँ नहीं भेजा जा रहा। प्रेम स्वयं यह तथ्य है कि ‘वहाँ’ और ‘यहाँ’ दो नहीं हैं।
चार — तो फिर कृष्ण और राम क्या हैं?
बालक:
पर महाराज, कृष्ण? राम? उनकी कथाएँ हैं। उनकी पत्नियाँ हैं। वे सच हैं ना? मेरी दादी कहती हैं, हाँ। वे कहती हैं — राम अयोध्या में रहे, धरती पर चले, रावण से लड़े। कृष्ण ने माखन चुराया, गोपियों के साथ नृत्य किया, अर्जुन का रथ चलाया। दादी विश्वास करती हैं।
संत:
तुम्हारी दादी एक तरह से सही हैं — पर उस सीधे अर्थ में नहीं जो तुम सोच रहे हो। सुनो — और अब हम और गहरे जाते हैं।
हमारी परंपरा में एक शब्द है — ‘उपाय’। इसका अर्थ है ‘कुशल साधन’। शिक्षिका जब छोटे बच्चे को ‘अ’ अक्षर सिखाने के लिए अनार का चित्र दिखाती है, तो वह उपाय का प्रयोग कर रही है। चित्र अक्षर नहीं है। अक्षर एक आकार है, एक भाव है, एक विचार है। पर बच्चे के लिए विचार कठिन है। चित्र सरल है। तो शिक्षिका विचार तक पहुँचने के लिए चित्र को द्वार बना देती है।
अब सोचो — किसी मनुष्य को पूरे ब्रह्मांड से प्रेम करना कैसे सिखाओगे? बच्चे को ब्रह्मांड के क्रम के प्रति श्रद्धा कैसे जगाओगे? यह बहुत बड़ा है। इसका कोई चेहरा नहीं है। तो हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने एक अद्भुत बात की। उन्होंने ब्रह्मांड को चेहरे दिए।
बाँसुरी बजाते कृष्ण — यह ब्रह्मांड का खेलते-नाचते स्वरूप हैं, उसका खिलखिलाता पक्ष। धनुष लिए राम — यह ब्रह्मांड का व्यवस्थित, धर्मनिष्ठ, न्यायी पक्ष हैं। ध्यान में बैठे शिव — यह ब्रह्मांड का विश्रांत स्वरूप हैं, सब हलचल से पहले और बाद का। सिंह पर सवार दुर्गा — यह ब्रह्मांड जब अव्यवस्था से अपनी रक्षा करता है। वीणा लिए सरस्वती — यह ब्रह्मांड का ज्ञान, संगीत, विद्या रूप। विघ्नहर्ता गणेश — यह ब्रह्मांड का वह मित्र जो हर नए कार्य के आरंभ में हमारे संग चलता है।
ये झूठ नहीं हैं। ये साधारण अर्थ में कहानियाँ भी नहीं हैं। ये द्वार हैं। ये वह तरीका हैं जिससे एक सीमित मन — तुम्हारा, मेरा, तुम्हारी दादी का — एक असीम सत्य को अपनी बाँहों में ले सकता है। तुम समुद्र को आलिंगन नहीं कर सकते। पर तुम एक चुल्लू पानी ले सकते हो, उसे देख सकते हो, और उसमें समुद्र को महसूस कर सकते हो। चुल्लू सच है। समुद्र और भी अधिक सच है। दोनों में विरोध नहीं है।
कट्टरपंथी की भूल यह है कि वह चुल्लू को ही समुद्र मान लेता है। वह कहता है — ‘कृष्ण मथुरा में फलाँ तारीख को रहे, और दिव्यता केवल उसी रूप में प्रकट हुई।’ यह छोटी सोच है। हठी नास्तिक की भूल यह है कि वह कहता है — ‘मथुरा में कोई कृष्ण नहीं था, इसलिए श्रद्धा करने योग्य कुछ भी नहीं है।’ यह भी छोटी सोच है। सत्य इन दोनों के बीच है, या इनसे परे है। कुछ है। वह केवल मथुरा में नहीं रहता, क्योंकि वह सब जगह है। उसके पास बाँसुरी नहीं है। पर तुम्हारी दादी की बाँसुरी बजाने वाला रूप उस ‘कुछ’ की ओर हृदय को मोड़ने का एक उत्तम साधन है। आइंस्टाइन का समीकरण भी एक साधन है। यह नदी जो हमारे सामने है, वह भी।
इसीलिए हमारे पास अनेक देवता हैं। एक चित्र काफ़ी नहीं था। इसलिए हमने दस हज़ार बनाए।
बालक:
तो कृष्ण और राम जैसे... एक ऐसी चीज़ के चित्र हैं जो बनाई नहीं जा सकती?
संत:
हाँ। और जो विवेकी है, वह जानता है कि चित्र चित्र है — और फिर भी उसे प्रेम करता है, क्योंकि चित्र हृदय को उस ओर खींचता है जो हृदय कभी सीधे नहीं देख सकता।
पाँच — परम सत्य क्या है?
बालक:
महाराज, आप ‘ब्रह्मांडीय ईश्वर,’ ‘अंतर्निहित सत्य’ कहते रहे हैं। क्या इसका कोई स्पष्ट नाम है? दार्शनिक इसे क्या कहते हैं?
संत ने नदी की ओर बहुत देर देखा।
संत:
इसके अनेक नाम हैं। अलग-अलग परंपराएँ अलग-अलग शब्दों में उसी एक चीज़ की ओर बढ़ती हैं। पश्चिमी दार्शनिक प्रायः ‘The Absolute’ — ‘परम सत्य’ कहते हैं — वह सत्य जो किसी और के सापेक्ष नहीं है, वह सत्य जिसका सब कुछ अंश है। हम भी आज रात इसी शब्द का प्रयोग करेंगे — परम सत्य। यह शब्द उपयुक्त है।
बहुत समय पहले दक्षिण भारत में एक महान दार्शनिक हुए — आदि शंकराचार्य। वे केवल बत्तीस वर्ष की आयु में चले गए — हाँ, बत्तीस वर्ष — और उतने छोटे जीवन में उन्होंने पूरे उपमहाद्वीप की पैदल यात्रा की और सत्य के बारे में लोगों के सोचने का ढंग बदल दिया। उन्होंने जिस दर्शन की स्थापना की, उसे ‘अद्वैत वेदांत’ कहते हैं। ‘अद्वैत’ का अर्थ है ‘दो नहीं।’ ध्यान दो — ‘एक’ नहीं, ‘दो नहीं।’ यह अंतर महत्वपूर्ण है।
शंकर ने कहा — एक सत्य है जो बस ‘है।’ उसका न आरंभ है, न अंत; न खंड हैं, न परिवर्तन। उन्होंने उसे परम सत्य कहा। वह अनेक सत्ताओं में एक सत्ता नहीं है। वह ब्रह्मांड में रहने वाला कोई देवता नहीं है। वह स्वयं ब्रह्मांड का ‘होनापन’ है। जब तुम हर वह गुण हटा दो जिसे नाम दिया जा सकता है, जो शेष रहता है — वही है। वह बिना विषय के चेतना है। वह हर देखने के पीछे का द्रष्टा है।
और फिर उन्होंने कुछ कहा जो आज भी लोगों को चौंका देता है। उन्होंने कहा — ‘तत् त्वम् असि।’ तू वही है। तुम — चट्टान पर बैठा यह छोटा बालक — तुम वही हो। तुम्हारा शरीर नहीं। तुम्हारा मन नहीं। तुम्हारा नाम नहीं। तुम्हारा सबसे गहरा ‘तुम’ — वह जो जानता है कि तुम्हारा शरीर, मन और नाम है — वही परम सत्य है। अंत में केवल एक चेतना है, जो आठ अरब आँखों से देख रही है, आठ अरब कानों से सुन रही है। अलगाव का भ्रम व्यवहार के लिए सच है। पर अंतिम सत्य नहीं।
देखो यह स्पिनोज़ा से कितना मिलता-जुलता है? स्पिनोज़ा ने कहा — एक तत्व है, हम सब उसके रूप हैं। शंकर ने कहा — एक परम सत्य है, हम सब उसमें प्रकट होते हैं। शब्द अलग। दृष्टि एक। दो विभिन्न परंपराएँ, हज़ार साल और सात हज़ार मील की दूरी पर अलग-अलग रास्तों से एक ही तट पर पहुँचती हैं — यह ध्यान देने योग्य है।
बालक:
पर महाराज, यदि मैं वही परम सत्य हूँ, तो मुझे इतना छोटा क्यों लगता है? मैं बुरे अंक आने से क्यों डरता हूँ?
संत हल्के से हँसे।
संत:
क्योंकि लहर जब उठ रही होती है, तब उसे समुद्र होने का एहसास नहीं होता। वह लहर बनने में व्यस्त है। समुद्र होने का अनुभव उसे तभी होगा जब वह गिरेगी। तब तक तुम लहर हो। और लहर का काम है — एक सुंदर लहर बनना। लहर होने को छोड़कर सीधे समुद्र मत बनना चाहो। यह बोध कि तुम समुद्र भी हो — वह अपने समय पर, अपनी साधना के साथ आता है।
छह — फिर बुराई का क्या?
लड़का चुप था। नदी अब अंधेरी हो चुकी थी। कुछ तारे निकल आए थे।
बालक:
महाराज, मैंने बहुत प्रश्न किए। पर सबसे कठिन प्रश्न का उत्तर अब भी नहीं मिला। यदि ईश्वर सब कुछ है — स्पिनोज़ा का ईश्वर, आइंस्टाइन का ईश्वर, आपका परम सत्य — तो ईश्वर वह आदमी भी है जो छोटी लड़की को चोट पहुँचाता है। ईश्वर भ्रष्ट नेता भी है। ईश्वर कैंसर की कोशिका भी है। तो फिर ‘ईश्वर नहीं है’ कहने में और इसमें क्या अंतर है? या और भी बुरा — क्या ईश्वर राक्षस है?
संत:
यह तुम्हारा सबसे गहरा प्रश्न है। मैं तुम्हें छोटा-सा उत्तर देकर अपमान नहीं करूँगा।
पहली बात — हाँ। यदि परम सत्य सब कुछ है, तो उसमें पीड़ा भी सम्मिलित है। उसमें क्रूरता भी सम्मिलित है। उसमें बलात्कार, हत्या और रोग भी सम्मिलित हैं। हम इस सच्चाई को छिपा नहीं सकते। हमें इसे बिना चकमा दिए सीधे देखना चाहिए, वरना हम गंभीर लोग नहीं हैं। जो तुम्हें कहे ‘ब्रह्मांड शुभ है,’ वह कुछ बेच रहा है।
दूसरी बात — वह धर्म जो वादा करता है ‘ईश्वर अच्छों को पुरस्कार और बुरों को दंड देगा, इसमें कोई संदेह नहीं’ — वह धर्म, मेरे विचार में, झूठा है। प्रत्यक्ष अनुभव से झूठा है। संसार ऐसे काम नहीं करता। संतों के बच्चे मरते हैं। राक्षसों के बच्चे फलते-फूलते हैं। अच्छी फसल बेईमान ज़मींदार के पास जाती है, और ईमानदार किसान भूखा रहता है। हमने यह सब देखा है। जो तुम्हें इसके विपरीत कहे, वह या तो मूर्ख है, या झूठा, या व्यापारी।
तीसरी बात — तो जब हम यह सांत्वना छोड़ देते हैं, तब क्या बचता है? ध्यान से सुनो। दो चीज़ें बचती हैं।
एक: ब्रह्मांड अन्यायी नहीं है। ब्रह्मांड उदासीन है। यह बारीक अंतर है। अन्याय का अर्थ है — कोई बेहतर का पात्र था, उसे नहीं मिला। उदासीनता का अर्थ है — वहाँ कोई न्यायालय ही नहीं है। बाघ हिरण को ‘अन्याय’ से नहीं खाता। भूकंप बच्चों को ‘अन्याय’ से नहीं मारता। ये बस घटित होते हैं। प्राकृतिक संसार में कोई नैतिकता नहीं है। नैतिकता वह है जो हम मनुष्य संसार में लेकर आते हैं। हम वे आँखें हैं जिनके माध्यम से ब्रह्मांड पूछना शुरू करता है — ‘क्या यह उचित है?’ यह एक छोटी आग है जो हमने एक आकाशगंगा के एक कोने के एक ग्रह पर जलाई है। यह कीमती है — दुर्लभ होने के कारण, ऊपर से किसी ने इसे थोपा है, इसलिए नहीं।
दूसरी: यदि नैतिकता ऊपर से लागू नहीं होती, तो उसे नीचे से जीना होगा। तुम्हारे और मेरे द्वारा। ब्रह्मांड बलात्कारी को सज़ा नहीं देगा; हमें देनी होगी — न्याय, क़ानून और सामाजिक प्रयासों के माध्यम से। ब्रह्मांड भूखे को भोजन नहीं देगा; हमें देना होगा। ब्रह्मांड शोकाकुल को सांत्वना नहीं देगा; हमें देनी होगी। ब्रह्मांड कैनवास है, पर चित्रकारी हमें ही करनी है। और कोई आ नहीं रहा। केवल हम हैं।
मेरी समझ में, यही गीता में कृष्ण का उपदेश है। दूसरा अध्याय ध्यान से पढ़ो। कृष्ण अर्जुन से यह वादा नहीं करते कि सही पक्ष जीतेगा। कृष्ण कहते हैं — लड़ो क्योंकि लड़ना धर्म है, और जो भी फल हो, होने दो। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ — कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर कभी नहीं। यह स्वर्ग के वादे से कहीं कठिन है। यह कुछ नहीं देने का वादा है — सिवाय एक गरिमा के, कि तुम सही काम सही होने के कारण कर रहे हो।
तो बेटा — मैं ऐसे ईश्वर पर विश्वास नहीं करता जो बलात्कारी को रोके। मैं ऐसे ईश्वर पर विश्वास नहीं करता जो भूखे बच्चे को खिलाए। ऐसा ईश्वर, यदि होता, तो जैसा संसार दिखता है, वैसा देखकर वह या तो अक्षम होता या क्रूर। मैं विश्वास करता हूँ एक ऐसी विशाल और सुंदर सत्ता पर जिसमें भयानक चीज़ें भी हैं — और मैं विश्वास करता हूँ कि एकमात्र ईमानदार उत्तर यह है कि उसी सत्ता का वह अंश बनो जो शुभ करता है। उन आँखों में से एक बनो जिनसे ब्रह्मांड अपनी पीड़ा देखता है। उन हाथों में से एक बनो जिनसे ब्रह्मांड अपनी पीड़ा हटाता है। ऐसा करते हुए हम उस चीज़ में सहभागी होते हैं जो शायद ‘पवित्र’ शब्द के सबसे क़रीब है।
लड़के की आँखों में आँसू थे। उसने उन्हें छिपाने का दिखावा नहीं किया।
सात — भारतीय जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे
संत:
और एक बात तुम्हें जाननी चाहिए, क्योंकि तुम पुस्तकें पढ़ने वाले बच्चे हो। तुम सोचते हो कि भारतीय परंपरा और नास्तिकता विपरीत हैं। ऐसा नहीं है। हमारी परंपरा अपने भीतर नास्तिकता को खुलकर समाहित किए हुए है — बिना किसी कांड के। क्या तुम यह जानते थे?
लड़के ने आश्चर्य से सिर हिलाया।
संत:
प्राचीन भारत में दर्शन के ऐसे संप्रदाय थे — जो विस्तृत संवाद का अंग थे — जो किसी भी सृष्टा-ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे।
एक थे चार्वाक — जिन्हें लोकायत भी कहते हैं। ये कठोर भौतिकवादी थे। उनका कथन था — केवल वह सच है जिसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। आत्मा शरीर का गुण है — जैसे लौ दीपक का गुण है; दीपक बुझा, लौ गई। न परलोक, न पुनर्जन्म, न आगे चलते कर्म, न ईश्वर। उन्हें इसके लिए न देश से बाहर किया गया, न जलाया गया। उनसे शास्त्रार्थ हुए। उनके अधिकांश ग्रंथ अब लुप्त हैं, पर अन्य संप्रदायों ने उनका उत्तर दिया — इसका अर्थ है कि उन्हें गंभीरता से लिया गया।
दूसरा था सांख्य संप्रदाय। बहुत प्रभावशाली, बहुत प्राचीन — गीता स्वयं इससे आधार लेती है। सांख्य द्वैतवादी है पर ईश्वरवादी नहीं। उसके लिए वास्तविकता दो तत्वों से बनी है — प्रकृति (पदार्थ, स्वभाव) और पुरुष (चेतना)। पर कोई सृष्टा-ईश्वर आवश्यक नहीं। ब्रह्मांड अकारण है; वह बस है। मुक्ति विवेक से आती है, ईश्वरीय कृपा से नहीं।
तीसरा था मीमांसा — वह संप्रदाय जिसने धर्म और कर्मकांड का सबसे गहन विश्लेषण किया। मीमांसा की कुछ धाराएँ खुले रूप से ईश्वरवादी नहीं थीं। उनका कथन था — कर्मकांड अपनी अंतर्निहित शक्ति से काम करते हैं, किसी देवता की कृपा से नहीं। वेद नित्य और अपौरुषेय हैं; किसी सृष्टा की आवश्यकता नहीं। शुद्ध धर्म, बिना देवता के।
और इनसे आगे — बौद्ध और जैन धर्म, दोनों उसी बौद्धिक संसार में जन्मे, अपने मूल रूप में ईश्वरवादी नहीं हैं। बुद्ध ने स्वयं सृष्टा-ईश्वर के बारे में पूछे जाने पर शिष्टता से उत्तर देने से मना किया। महावीर के ब्रह्मांड में कोई रचयिता नहीं है।
तो जब तुम्हारा हठी नास्तिक मित्र कहे ‘धर्म मूर्खों के लिए है,’ तब उसे विनम्रता से कहना — चार्वाक, सांख्य और बुद्ध इससे असहमत थे, और वे यह काम हिचेन्स साहब से ढाई हज़ार साल पहले कर रहे थे।
और जब कोई बड़ी-बूढ़ी कहे कि गंभीर मनुष्य होने के लिए व्यक्तिगत ईश्वर पर विश्वास आवश्यक है, तब उसे और भी विनम्रता से कहना — हमारी अपनी परंपरा के पूरे संप्रदाय इस पर विश्वास नहीं करते थे, और हज़ारों साल तक उन्हें पूरी गंभीरता से लिया गया।
हमारी परंपरा एक वन है, बेटा। उसमें मंदिर बनाने वाला है। उसमें गुफा में रहने वाला है। उसमें बाज़ार में तर्क करता भौतिकवादी है। उसमें मौन योगी है जिसने शब्द छोड़ दिए हैं। भूल हमेशा यही होती है — एक वृक्ष को पूरा वन समझ लेना।
आठ — दुनिया भर में — एक ब्रह्मांड, अनेक नाम
बालक:
महाराज — एक बड़ा प्रश्न। अमेरिका के लोगों का अपना ईश्वर है। अरब देशों के लोगों का अपना। मेरा एक सहपाठी ईसाई है, वह कहता है उसका यीशु ही एकमात्र सच्चा ईश्वर है। मेरी एक मित्र मुस्लिम है, उसके लिए अल्लाह ही एकमात्र सच्चा ईश्वर है। मेरी दादी कहती हैं कृष्ण। सब निश्चित हैं। पर सब सही नहीं हो सकते। यह पृथ्वी ब्रह्मांड में इतनी छोटी है — तो ब्रह्मांडीय सत्य, यदि वह है, तो सबके लिए एक ही होना चाहिए ना? तो फिर सब लड़ क्यों रहे हैं? धर्म के नाम पर इतनी हिंसा क्यों है? क्या यह कभी रुकेगी?
संत ने आकाश की ओर बहुत देर देखा। पहले तारे अब चमक रहे थे।
संत:
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है जो तुम कभी पूछोगे। बहुत ध्यान से सुनो — क्योंकि हमारी प्रजाति का भविष्य इसी पर निर्भर है कि अगली पीढ़ी इस उत्तर को सही ढंग से समझे।
पहली बात — हाँ। परिभाषा से ही ब्रह्मांडीय सत्य एक है। पृथ्वी एक साधारण तारे की परिक्रमा करता एक छोटा-सा धूलकण है, और वह तारा एक साधारण आकाशगंगा के किनारे पर है, और ब्रह्मांड में दो ट्रिलियन आकाशगंगाएँ हैं। परम सत्य चाहे जो भी हो, वह भारतीय नहीं है। वह अमेरिकी नहीं है। वह अरब नहीं है। हो ही नहीं सकता। ब्रह्मांड तेरह अरब वर्षों तक यहाँ था इससे पहले कि किसी मनुष्य का कोई धर्म हुआ। ब्रह्मांड किसी का पासपोर्ट नहीं देखता। तो यदि सबसे गहरा सत्य है, तो — हाँ — अमेरिकी का सबसे गहरा ईश्वर, अरब का सबसे गहरा ईश्वर, तुम्हारी दादी का सबसे गहरा ईश्वर, और चिली में बैठे एक नास्तिक खगोलविद का सबसे गहरा ईश्वर — एक ही हैं। होने ही चाहिए। और कोई जगह नहीं है उनके होने के लिए।
अब इसे ध्यान से सुनो — और तुम कुछ ऐसा देखोगे जो बहुत कम लोग समझते हैं। यदि तुम हर परंपरा के सबसे गहरे संत-दार्शनिकों को पढ़ो, वे सब एक ही बात कहते हैं। इस्लाम के सूफ़ी पढ़ो — रूमी, इब्न अरबी, हल्लाज — वे ऐसे ईश्वर का वर्णन करते हैं जो हर नाम से परे है, हर चेहरे में उपस्थित है, जिसके साथ साधक एक हो जाता है। ईसाई संत-दार्शनिक पढ़ो — माइस्टर एकहार्ट, जॉन ऑफ़ द क्रॉस, हिल्डेगार्ड — वे एक ऐसे दिव्य तत्व का वर्णन करते हैं जो ईश्वर से भी परे है, जिसका व्यक्ति-यीशु एक मुख है। यहूदी रहस्यवाद पढ़ो — कब्बाला — वे ‘ऐन सोफ़’ का वर्णन करते हैं — असीम, हर नाम से परे। चीन के ताओवादी पढ़ो — वे उस ‘ताओ’ का वर्णन करते हैं जिसे नाम नहीं दिया जा सकता, जो दस हज़ार वस्तुओं का स्रोत है। अपने ही उपनिषद पढ़ो — वे परम सत्य का वर्णन करते हैं — सब गुणों से परे, हर हृदय में स्थित। प्राचीन यूनान के प्लोटिनस को पढ़ो — वे इसे केवल ‘द वन’ — ‘वह एक’ कहते हैं। बौद्धों को पढ़ो — वे इसे ‘तथता,’ ‘शून्यता,’ ‘अनुपाधिक’ कहते हैं।
अब देखो वे सब मिलकर क्या कह रहे हैं। वही आकार। वही गहराई। वही दृष्टि — कि एक ही सत्य है; कि नाम उसकी ओर इशारा करते हैं पर उसे पकड़ नहीं पाते; कि साधक उसे अपने ही गहरे अस्तित्व के रूप में पाता है; और कि उसका एकमात्र उचित प्रत्युत्तर है — श्रद्धा, विनम्रता और प्रेम।
इसे ‘शाश्वत दर्शन’ — perennial philosophy कहते हैं। हर परंपरा के संत-दार्शनिक, समुद्रों और सदियों से अलग — सहमत हैं। वे एक ही पर्वत पर अलग-अलग रास्तों से चढ़ रहे हैं। शिखर पर पहुँचने पर वे एक-दूसरे को हाथ हिलाते हैं और हँस पड़ते हैं। यह झगड़ा धर्मों के बीच नहीं है। यह कभी धर्मों के बीच रहा ही नहीं। यह झगड़ा धर्म की सतह और धर्म की गहराई के बीच है।
बालक:
तो फिर इतनी लड़ाई क्यों है? लोग ईश्वर के नाम पर एक-दूसरे को क्यों मार रहे हैं?
संत:
क्योंकि अधिकांश समय अधिकांश धर्म ‘सत्य’ के बारे में नहीं होता। वह ‘पहचान’ के बारे में होता है। ध्यान से सुनो। दो बिल्कुल अलग चीज़ें हैं जिन्हें हम ‘धर्म’ नाम से पुकार लेते हैं।
एक है — खोज के रूप में धर्म। संत, ऋषि और साधक का मार्ग। यह व्यक्ति कहता है — मैं नहीं जानता कि अंतिम सत्य क्या है। मैं जीवन भर इसे ढूँढने का प्रयास करूँगा। मैं ज्ञानियों को पढ़ूँगा। मौन में बैठूँगा। पड़ोसी से प्रेम करूँगा, क्योंकि यदि कोई गहरा सत्य है, तो मेरा पड़ोसी भी वही है। ऐसा व्यक्ति जैसे-जैसे बढ़ता है, और विनम्र होता जाता है। उसे किसी को धर्मांतरित करने की आवश्यकता नहीं। वह बहुत व्यस्त है — खोज में। वह हर परंपरा के साधक का सगा है, चाहे साधक किसी भी नाम का प्रयोग करे।
दूसरा है — पहचान के रूप में धर्म। जनजाति का मार्ग। यह व्यक्ति कहता है — मैं इस समूह में जन्मा हूँ। मेरे समूह की ये कथाएँ हैं। दूसरे समूहों की अलग कथाएँ हैं। इसलिए मेरा समूह सही है, अन्य समूह ग़लत हैं। यह सच में ईश्वर के बारे में है ही नहीं। यह ‘जुड़ाव’ के बारे में है। यही मस्तिष्क-यंत्र है जो हमें अपनी क्रिकेट टीम की हौसला-अफज़ाई कराता है। यही यंत्र था जो आदिम जनजातियों को अपने अलाव के पास खड़ा कर अंधेरे में दूसरी जनजाति की आग देखता रखता था। यह बहुत प्राचीन है। यह हम सबमें है। और यह ख़तरनाक है।
लगभग सारी धार्मिक हिंसा दूसरे प्रकार की है, जो पहले प्रकार का स्वाँग कर रही है। जो भीड़ कृष्ण के नाम पर मारती है, वह कृष्ण को नहीं समझती। जो भीड़ अल्लाह के नाम पर मारती है, वह अल्लाह को नहीं समझती। जो भीड़ ईसा के नाम पर मारती है, वह ईसा को नहीं समझती। गीता में कृष्ण आसक्ति रहित और समबुद्धि की माँग करते हैं। क़ुरान में एक आयत है — सूरह 5, आयत 32 — जो कहती है कि जिसने एक निर्दोष की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या की। ईसा ने कहा — अपने शत्रु से प्रेम करो। हर परंपरा का संत-दार्शनिक हर दूसरी परंपरा के संत-दार्शनिक के अधिक क़रीब है, बजाय अपनी ही परंपरा की हिंसक भीड़ के।
बालक:
तो साधारण धार्मिक लोग क्या नहीं देख पा रहे? मेरी दादी हिंसक नहीं हैं। मेरा ईसाई मित्र हिंसक नहीं है। फिर भी दोनों मानते हैं कि केवल उनका ईश्वर सच है।
संत:
तीन बातें, बेटा। तीन साधारण-सी बातें — और लगभग हर मानव सभ्यता की समस्या की जड़ यहीं है।
एक — उन्हें सतह और गहराई का अंतर सिखाया ही नहीं गया। बचपन में उन्हें सतह दे दी गई — उन्हीं लोगों के द्वारा जो उनसे प्रेम करते थे — और उन्होंने सतह को ही सम्पूर्ण समझ लिया। दादी ने कृष्ण को आकाश में सोने का बालक बताकर दे दिया, और किसी ने बैठाकर नहीं समझाया कि कृष्ण द्वार है, अल्लाह द्वार है, यीशु द्वार है — और द्वार के पार का कमरा एक ही है। जब तक यह नहीं सुनेंगे, द्वारों पर ही लड़ते रहेंगे।
दो — उन्हें एक ही पर्वत पर चढ़ने के अन्य मार्गों के बारे में नहीं बताया गया। उन्होंने केवल एक रास्ता देखा। इसलिए उन्हें यह समझ नहीं कि दूसरों के रास्ते भी ऊपर ही जाते हैं। वे सोचते हैं — दूसरे कहीं नहीं जा रहे। यदि बचपन से हर हिंदू थोड़ा क़ुरान पढ़े, हर मुसलमान थोड़ी गीता, हर ईसाई थोड़ा ताओ ते चिंग, हर नास्तिक थोड़े उपनिषद — और हम एक-दूसरे को खंडन के लिए नहीं, बल्कि सत्य खोजने के लिए पढ़ें — तो आधी धार्मिक लड़ाइयाँ इतिहास में होतीं ही नहीं। तुलनात्मक ज्ञान की शिक्षा सबसे शांतिप्रिय आविष्कारों में से है, और हम इसे करते बहुत कम हैं।
तीन — उन्होंने धूर्त लोगों को धर्म को सत्ता के लिए हथियार बनाने दिया। ऐसे राजनेता जिन्हें वास्तव में किसी पवित्र चीज़ से कोई सरोकार नहीं — उन्होंने सीख लिया है कि वे एक समूह को दूसरे समूह से डराकर चुनाव जीत सकते हैं। टीवी चैनलों ने सीख लिया है कि क्रोध बढ़ाकर वे अधिक विज्ञापन बेच सकते हैं। प्रचारकों ने सीख लिया है कि स्वर्ग का प्रलोभन देकर और नरक की धमकी देकर वे चढ़ावा बटोर सकते हैं। मूल संत-दार्शनिक इस शोर में लुप्त हो जाता है। बच जाती है — पहचान-धर्म की हथियारबंद रूप — जिसे चलाने वाले न ईश्वर से प्रेम करते हैं न मनुष्य से। उनका प्रेम है — वोट, धन और सत्ता। यह धर्म का सबसे गहरा, सबसे पुराना, सबसे विश्वसनीय भ्रष्टाचार है। और यह तब तक नहीं रुकेगा जब तक साधारण लोग इसके लिए ‘उपयोग होने’ से इनकार नहीं करते।
बालक:
इसे रोका कैसे जा सकता है, महाराज? सच में। क्या किया जा सकता है?
संत:
यह जल्दी नहीं रुकेगा। हम यह काम हज़ारों वर्षों से कर रहे हैं। पर इसे काफ़ी कम किया जा सकता है — और हर पीढ़ी पिछली से बेहतर कर सकती है, यदि वह यह काम गंभीरता से ले। पाँच चीज़ें हम कर सकते हैं।
पहली — बच्चों को सबसे छोटी उम्र से शाश्वत दृष्टि सिखाओ। उन्हें कहो — अनेक परंपराएँ, एक पर्वत। उन्हें रूमी की कविताएँ, ईसा का गिरि-प्रवचन, गीता, ताओ, बुद्ध की शिक्षाएँ — साथ-साथ दिखाओ। उन्हें अपनी आँखों से एकता देखने दो। बच्चे धर्म में जनजातीय होकर पैदा नहीं होते। उन्हें ऐसा सिखाया जाता है। हम उन्हें अलग ढंग से सिखा सकते हैं।
दूसरी — संत और भीड़ का अंतर पहचानो। अपनी परंपरा के संतों का सम्मान करो — कबीर, मीराबाई, तुलसीदास, विवेकानंद, गांधी, टैगोर — और हर अन्य परंपरा के संतों का भी सम्मान करो। उन धार्मिक नेताओं से प्रभावित होने से इनकार करो जो दूसरे समूहों को कोसते हैं। पहला संकेत कि किसी ने मूल बात खो दी है — वह बाहरी लोगों पर क्रोध करता है। संत बाहरी से प्रेम करता है। भीड़ बाहरी से घृणा करती है। यह अंतर याद रखो और उसी के अनुसार जाँच करो।
तीसरी — उन लोगों को वोट देने से इनकार करो जो धर्म को सत्ता के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह छोटा-सा नागरिक कर्म, बहुत बड़े परिणाम लाता है। वह राजनेता जो तुम्हारे कान में फुसफुसाता है कि तुम्हें दूसरे समूह से डरना चाहिए — वह तुम्हारे जीवन में मिलने वाला सबसे आध्यात्मिक रूप से ख़तरनाक व्यक्ति है। उसे पहचानो। उसे वोट देना बंद करो। जिस दिन पर्याप्त नागरिक यह कर देंगे, उसकी रणनीति काम करना बंद कर देगी।
चौथी — चुपचाप साधना करो। शांत साधक — जो दीया जलाता है, मौन में बैठता है, धीरे-धीरे पढ़ता है, और किसी और का धर्म बदलने की चाह नहीं रखता — वही उपचार है। ज़ोरदार धर्म विभाजित करता है। शांत धर्म जोड़ता है। अपनी भक्ति में शांत रहो और दूसरे शांत साधकों को भी अपनी भक्ति में शांत रहने दो। शांत लोग एक-दूसरे को हर सीमा के पार पहचान लेंगे।
पाँचवीं — ब्रह्मांडीय दृष्टि अपनाओ। जब हो सके, रात के आकाश को देखो। याद रखो — सच में याद रखो — कि पृथ्वी एक अकल्पनीय विशालता में एक धूल का कण है। जो भी इस विशालता के हृदय में है, वह किसी देश, भाषा, पुस्तक या मंदिर की संपत्ति नहीं है। वह सबका है, और किसी का नहीं। उस दृष्टि से, उसके नाम पर लड़ना — बिल्कुल वैसा ही दिखता है जैसा यह है — छोटा और दयनीय। बुरा नहीं — दयनीय। लोग एक चीज़ के टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं जिसकी पूर्णता को वे सब भूल चुके हैं।
क्या यह काफ़ी होगा? मुझे नहीं पता। निराशावादी कहेंगे — नहीं। निराशावादी कभी-कभी सही होते हैं। पर मैं तुम्हें यह कहूँगा — यदि हर पीढ़ी में कुछ बच्चे यह बात समझकर बड़े हों, जो हम अभी समझ रहे हैं, तो संसार धीरे-धीरे, सदी दर सदी अधिक शांत होता जाता है। मानव चेतना का चाप लंबा है, और बहुत धीरे-धीरे, एकीकरण की ओर मुड़ता है। तुम उन बच्चों में से एक हो सकते हो जो उसे और मोड़ते हैं।
लड़के ने ऊपर देखा। आकाशगंगा अब नदी के ऊपर अंत-से-अंत तक दिखाई दे रही थी — एक धुँधली चाँदी की लकीर, जिसमें वास्तव में दो सौ अरब तारे जल रहे थे, हर एक पूरी मानव कथा से भी प्राचीन।
बालक:
यह तो बहुत बड़ा है, महाराज।
संत:
हाँ, बेटा। बहुत बड़ा है। और जितना अधिक तुम इसे अपने मन में बड़ा होने दो, उतनी छोटी होती जाती है धरती पर हर लड़ाई। यही असली औषधि है। रोज़ लो। रात का आकाश मुफ़्त है।
नौ — फिर हम पूजा क्यों करते हैं?
बालक:
महाराज, तो मुझे पूछना ही पड़ेगा — यदि कृष्ण द्वार हैं, यदि परम सत्य अव्यक्तिगत है, यदि नास्तिकता हमारी ही परंपरा में सम्मिलित है, यदि हर अन्य परंपरा भी उसी सत्य की ओर इशारा करती है — तो मेरी माँ रोज़ शाम दीया क्यों जलाती हैं? आप, महाराज, गोधूलि में नदी किनारे क्यों चलते हैं? साधना का प्रयोजन क्या है?
संत मुस्कुराए — गहरी मुस्कान, मानो यही प्रश्न उन्हें सबसे अधिक प्रिय लगा हो।
संत:
बुद्ध से किसी ने ऐसा ही प्रश्न पूछा था। उन्होंने कहा — जब प्यासा कुएँ तक पहुँचता है, तो वह किनारे खड़ा होकर यह नहीं सोचता कि कुआँ सच में है या नहीं। वह पीता है। कुएँ का कुआँ-होना पीने से सिद्ध होता है, विश्लेषण से नहीं।
साधना भी ऐसी ही है। हम दीया इसलिए नहीं जलाते कि कोई स्वर्गिक हिसाब-कीताबी उसे एक तालिका में जोड़ ले। हम इसलिए जलाते हैं कि दीया जलाने का कर्म स्वयं हम पर कुछ करता है। एक मिनट के लिए वह हमें ‘ग्रेडों, बिलों और चिंताओं वाले छोटे प्राणी’ के शोर से बाहर निकालकर रहस्य की उपस्थिति में रख देता है। दीया जादुई नहीं है। दीया जलाने वाला हाथ बदलता है — यही जादू है।
ऐसे सोचो — एक संगीतकार रोज़ रियाज़ करता है। रियाज़ संगीत नहीं है। कोई भी कार्यक्रम में रियाज़ सुनने नहीं आता। पर बिना रियाज़ के कोई कार्यक्रम भी नहीं। रियाज़ हाथों का तरीक़ा है — अपनी विस्मृति को ठीक रखने का।
पूजा हृदय का तरीक़ा है — अपनी विस्मृति को ठीक रखने का। हृदय बहुत आसानी से भूल जाता है — कि वह छोटा है और ब्रह्मांड विशाल। हृदय भूल जाता है कि जिनसे हम प्रेम करते हैं वे मरेंगे, और हम भी। हृदय कृतज्ञता भूल जाता है। हृदय विस्मय भूल जाता है। हृदय भूल जाता है कि यह क्षण — यहाँ — ही एकमात्र क्षण है जो हमारे पास है। हज़ारों छोटे पूजा-कर्म — दीया, नमस्ते, कुछ क्षण मौन, एक श्लोक का पाठ, नदी के किनारे चहलक़दमी — ये हृदय के दैनिक रियाज़ हैं। ये हृदय को उन क्षणों के लिए सुर में रखते हैं जो असली होते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी यह बात मानता है, यदि तुम चाहो। अनुसंधान — व्यवस्थित अध्ययन, नियंत्रण और मापदंडों के साथ — दिखाते हैं कि ध्यान-साधना तनाव घटाती है, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, अवसाद कम करती है, आयु बढ़ाती है। किसी देवता के पुरस्कार से नहीं — साधक स्वयं अधिक सम्पूर्ण होता जाता है, इसलिए।
तो दीया जलाओ, बेटा। या न जलाओ। पर यदि जलाओ, तो लेन-देन की तरह नहीं। एक सुर में लाने की तरह जलाओ। एक छोटे दैनिक स्मरण की तरह — मैं किसी ऐसी चीज़ का अंश हूँ जिसके किनारे मुझे नहीं दिखते, और यह तथ्य रुककर ध्यान देने योग्य है।
दस — मैं जीवन कैसे जिऊँ?
लड़के ने फिर तारों की ओर देखा।
बालक:
एक अंतिम प्रश्न, महाराज। मैं जीवन कैसे जिऊँ?
संत बहुत देर तक सोचते रहे।
संत:
मैं तुम्हें पाँच वाक्य दूँगा। कंठस्थ कर लो। ये पर्याप्त हैं।
पहला — विस्मय। इसकी क्षमता कभी मत खोना। जो व्यक्ति आश्चर्य करना भूल गया, वही असल में मरा हुआ नास्तिक है — और यह अच्छे अर्थ में नहीं है। तारों को देखो। पत्ते को देखो। अपने ही हाथ को देखो — और उससे क्या-क्या हो सकता है। ब्रह्मांड में कुछ भी असाधारण न हो — ऐसा कुछ नहीं है, यदि तुम पर्याप्त देर देखो।
दूसरा — अपना धर्म करो। वह काम जो तुम्हारा है, उसे ढूँढो, और अच्छा करो — और संसार की तालियों पर निर्भर मत हो। कुछ दिन संसार ताली बजाएगा। ज़्यादातर दिन नहीं बजाएगा। काम के लिए काम करो, तालियों के लिए नहीं। यह गीता का पूरा उपदेश है, पाँच शब्दों में — कर्म करो, फल के लिए नहीं।
तीसरा — दयालु बनो। ब्रह्मांड दया लागू नहीं करता। तो हमें करनी होगी। दया का हर कर्म एक छोटी ज्योति है — एक विशाल उदासीनता के सामने। उन ज्योतियों में से एक होने की गरिमा को छोटा मत समझो।
चौथा — हर परंपरा में वही गहराई देखो। किसी और की ईश्वर-खोज को केवल इसलिए झूठा मत कहो कि शब्द तुम्हारे शब्दों से अलग हैं। तुम्हारी परंपरा का संत और उनकी परंपरा का संत — एक ही पर्वत पर चढ़ रहे हैं। इस पर हर्षित हो। तुम भी सहयात्री बनो। किसी की ‘कबीला सेना’ में भर्ती होने से इनकार करो।
पाँचवाँ — ‘न जानने’ के साथ शांति बना लो। तुम मरोगे — यह निश्चित जाने बिना कि क्या कोई ईश्वर उस तरह है जैसे तुम्हारी दादी मानती हैं। मैं भी ऐसे ही मरूँगा। हर संत और ऋषि ऐसे ही मरे। ‘न जानना’ हार नहीं है। यह जिज्ञासा की भूमि है। उसमें आराम से बैठो। नासदीय सूक्त चार हज़ार वर्ष पहले उसमें आराम से बैठा था। तुम भी बैठ सकते हो।
लड़का खड़ा हो गया। उसने बहुत गंभीरता से नमस्ते किया, और संत ने उतनी ही गंभीरता से नमस्ते लौटाया।
लड़का घर की ओर मुड़ा। फिर मुड़कर बोला —
बालक:
महाराज — एक और बात। क्या आप परम सत्य हैं? क्या मैं हूँ?
संत हँसे — एक मृदु, स्नेहिल हँसी, जिसमें नदी भी हँसती सी लगी।
संत:
घर जाओ, बेटा। माँ से कहो कि तुम उनसे प्रेम करते हो। भोजन खाओ। पाठ करो। परम सत्य का प्रश्न — तुम उसमें जीते-जीते उतरोगे। आज रात इसे हल करने का प्रयास मत करो। यह स्वयं तुम्हें — अपने ढंग से — अगले साठ वर्षों में उत्तर देगा।
लड़का घर चला गया। संत कुछ देर और बैठे रहे — तारों को नदी के अंधेरे दर्पण में एक-एक करके निकलते देखते हुए।
एक छोटी शब्दावली — आगे पढ़ने के लिए
परम सत्य (The Absolute)
वह सत्य जो किसी और के सापेक्ष नहीं है — वह सत्य जिसका सब कुछ अंश है। इसे ‘द वन’, ‘अस्तित्व का आधार’, ‘अंतिम वास्तविकता’, ‘निरुपाधिक’, ‘स्रोत’ भी कहते हैं। अलग-अलग परंपराएँ अलग-अलग शब्दों में इसकी ओर बढ़ती हैं। यह कोई सत्ता नहीं है — यह स्वयं ‘होनापन’ है — जो भी ‘है’, उसका ही ‘है’ होना।
अद्वैत वेदांत
आदि शंकराचार्य (लगभग 8वीं सदी) द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवादी दर्शन। ‘अद्वैत’ का अर्थ है — ‘दो नहीं’। यह सिखाता है कि अंतिम सत्य एक अखंड चेतना है, और संसार की प्रतीत होती विविधता उस एक सत्य पर माया का आवरण है। ‘तत् त्वम् असि’ — तू वही है — इसकी केंद्रीय शिक्षा है।
आत्मा
वह गहरा ‘मैं’ — शरीर और मन के पीछे का साक्षी चैतन्य। अद्वैत का साहसी कथन यह है कि यह आत्मा और परम सत्य दो नहीं हैं — सबसे गहरा ‘तुम’ और ब्रह्मांड का सबसे गहरा सत्य — दोनों एक हैं।
स्पिनोज़ा का ईश्वर / Deus sive Natura
17वीं सदी के दार्शनिक बारुख स्पिनोज़ा का ईश्वर। न कोई व्यक्ति, न कोई सृष्टा, न संसार से अलग — बल्कि वह एकमात्र शाश्वत तत्व जिसका संसार अभिव्यक्ति है। ‘Deus sive Natura’ का अर्थ है — ‘ईश्वर अथवा प्रकृति’ — एक ही सत्य के दो नाम। पूरब के अद्वैतवादी दर्शन के बहुत क़रीब।
ब्रह्मांडीय धर्मभाव
आइंस्टाइन के द्वारा दिया गया नाम — डर-धर्म और नैतिकता-धर्म से परे — धर्म का तीसरा और सर्वोच्च रूप। यह वह श्रद्धा और विनम्रता है जो विचारशील प्राणी ब्रह्मांड के क्रम, गहराई और सुंदरता के सामने अनुभव करता है। विज्ञान के साथ संगत। विस्मय से अविभाज्य।
चार्वाक / लोकायत
प्राचीन भारत का कठोर भौतिकवादी संप्रदाय। मानता था कि केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, चेतना पदार्थ से उत्पन्न होती है और शरीर के साथ समाप्त, और कोई सृष्टा-ईश्वर, आत्मा या परलोक नहीं। यह व्यवहार में नास्तिक था और भारतीय दार्शनिक संवाद का अंग था।
सांख्य
भारत के छह शास्त्रीय दर्शनों में से एक। द्वैतवादी पर ईश्वरवादी नहीं — वास्तविकता दो तत्वों से बनी है — प्रकृति (पदार्थ) और पुरुष (चेतना) — कोई सृष्टा-ईश्वर अनिवार्य नहीं। मुक्ति विवेक से, दिव्य कृपा से नहीं। गीता पर इसका गहरा प्रभाव है।
मीमांसा
भारतीय दर्शन का एक और शास्त्रीय संप्रदाय — धर्म और कर्मकांड के विश्लेषण पर केंद्रित। इसकी कुछ प्रसिद्ध धाराएँ खुले रूप से ईश्वरवादी नहीं थीं — मानती थीं कि वेद नित्य और अपौरुषेय हैं और कर्मकांड अपनी अंतर्निहित शक्ति से फलदायी हैं, बिना किसी देवता की कृपा के।
नासदीय सूक्त
ऋग्वेद 10.129 — संसार की संभवतः सबसे प्राचीन अज्ञेय कविता। यह सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए इन पंक्तियों पर समाप्त होती है — ‘यह सृष्टि कहाँ से उठी — शायद इसने अपने आप को बनाया, शायद नहीं — केवल वही जानता है जो सबसे ऊँचे आकाश से देखता है। और शायद वह भी न जानता हो।’
उपाय
‘कुशल साधन’। शिक्षण की वह विधि जिसमें एक असीम और सूक्ष्म सत्य को सीमित और सरल रूप दिया जाता है ताकि साधक उस तक पहुँच सकें। हर परंपरा के व्यक्तिगत देवता (कृष्ण, अल्लाह, यीशु, गुणयुक्त बुद्ध, गुणयुक्त ताओ) को उपाय समझा जा सकता है — मनुष्य के हृदय के अनुकूल द्वार — न कि अंतिम सत्य का अंतिम बिंदु।
कर्मयोग
गीता का उपदेश — कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं — फल की आसक्ति से मुक्त कर्म का मार्ग। यह उपदेश ब्रह्मांडीय न्याय पर निर्भर नहीं है — यह उस ब्रह्मांड के लिए ही है जिसमें ब्रह्मांडीय न्याय भरोसेमंद नहीं।
शाश्वत दर्शन (Perennial Philosophy)
यह अवलोकन कि हर परंपरा के सबसे गहरे संत-दार्शनिक — सूफ़ी, ईसाई, यहूदी, ताओवादी, वेदांती, बौद्ध, आदिवासी — एक ही सत्य का संगत वर्णन करते हैं। नाम अलग। कथाएँ अलग। पर अंतर्निहित दृष्टि — कि एक ही असीम सत्य है, कि नाम उसकी ओर इशारा करते हैं, कि वह अपने ही गहरे अस्तित्व में मिलता है — एक ही पर्वत के अनेक मार्ग।
लेखक की अंतिम टिप्पणी
यह संवाद किसी को किसी विश्वास में बदलने के लिए नहीं लिखा गया है। यह न धर्म-समर्थक है, न धर्म-विरोधी। यह केवल यह दिखाने के लिए है कि ‘अंध-भक्त’ बनाम ‘कट्टर नास्तिक’ — इन दो विकल्पों के बीच एक बहुत व्यापक बौद्धिक भूमि है। और यह भूमि किसी भी देश, किसी भी परंपरा के व्यक्ति के लिए खुली है — जो ईमानदारी से सोचने को तैयार हो।
यदि सोच-विचार के बाद आप आइंस्टाइन और स्पिनोज़ा के ब्रह्मांडीय धर्म की ओर खिंचते हैं — ब्रह्मांड के क्रम के सामने एक गहरी श्रद्धा, बिना किसी व्यक्तिगत दिव्य पुरुष के — तो आप अच्छी संगति में हैं। और शायद बिना जाने आप उपनिषदों, सूफ़ी संतों, ईसाई चिंतकों, ताओवादी ऋषियों के मूल भाव के बहुत क़रीब भी हैं। नदी वही नदी है — चाहे आप उसे ब्रह्मांड कहें, परम सत्य, प्रकृति, ताओ, या केवल नदी।
और यदि आप, अभी, उस कमरे में बैठते हैं जहाँ माता-पिता दीया जला रहे हैं, या उस कमरे में चुपचाप खड़े होते हैं जहाँ कोई मित्र किसी अन्य भाषा में किसी अन्य नाम की प्रार्थना कर रहा है — और आप उस छोटी ज्योति, उस अंधेरे कमरे और बीच के प्रेम को महसूस करते हैं, और तत्व-मीमांसा पर एक भी शब्द नहीं कहते — यह भी संसार में रहने का एक उत्तम ढंग है। दीया आपकी सहमति की माँग नहीं करता। वह केवल आपकी उपस्थिति की माँग करता है। उपस्थित रहो। दयालु रहो। विस्मय करो। यही पर्याप्त है।
पुनश्च: यह विचार मूलतः मेरा अपना है। मैं पिछले 18 वर्षों से अपने ब्लॉग पर इस पर सोचता और लिखता रहा हूँ, परंतु AI की सहायता से ही मैं इतना विस्तृत ब्लॉग लिख सका। AI के बिना मैं अपनी भावनाओं को इतनी गहराई से अभिव्यक्त नहीं कर पाता। निस्संदेह, यह ब्लॉग केवल एक दृष्टिकोण है — मेरा अंतिम विचार नहीं। मेरी जिज्ञासा अंतिम साँस तक समाप्त नहीं होगी।